
ऋषि और कृषि संस्कृति का मिलन ही सीताराम का मिलन : डॉ. मदन मोहन मिश्रा

जौनपुर। शीतला चौकियां धाम में आयोजित पांच दिवसीय श्रीराम कथा के तीसरे दिन वाराणसी से पधारे कथावाचक डॉ. मदन मोहन मिश्रा ने ऋषि और कृषि संस्कृति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऋषि और कृषि संस्कृति का मिलन ही सीताराम का मिलन है। भगवान श्रीराम का जन्म यज्ञ के प्रसाद से हुआ, इसलिए वे ऋषि संस्कृति के प्रतीक हैं, जबकि माता सीता का प्राकट्य राजा जनक के हल चलाने से हुआ, इसलिए वे कृषि संस्कृति की प्रतीक हैं।
उन्होंने कहा कि पहले देश ऋषि प्रधान था, फिर कृषि प्रधान हुआ और आज कुर्सी प्रधान हो गया है। जब जनक साधना रूपी खेती में अनुष्ठान रूपी हल चलाते हैं, तभी भक्ति रूपी सीता की प्राप्ति होती है। बुद्धिजीवी जब श्रमजीवी बनेगा, तभी राष्ट्र का कल्याण होगा। उन्होंने लोगों को भौतिक सुख-सुविधाओं से दूर प्रकृति के सानिध्य में भी समय बिताने की प्रेरणा दी।
माता सीता के आभूषणों का आध्यात्मिक अर्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि हाथों में सेवा रूपी कंगन, कमर में संयम की करधनी और पैरों में सदाचार की पायल होनी चाहिए। इससे मनुष्य भक्ति और शांति के मार्ग पर आगे बढ़ता है। उन्होंने अपवर्ग की चर्चा करते हुए कहा कि जानबूझकर पाप न करना, फल की इच्छा का त्याग करना, बंधन से दूर रहना और ममता छोड़ना ही आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।
इस अवसर पर डॉ. अखिलेश चंद्र पाठक ने सत्संग की महिमा बताते हुए कहा कि अच्छे लोगों के संग से मनुष्य में सद्गुणों का विकास होता है। सत्संग से विवेक जागृत होता है तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी मानसिक विकृतियां कम होती हैं। मानवता, महापुरुषों का सानिध्य और मोक्ष की अभिलाषा मानव जीवन को सार्थक बनाते हैं।
कार्यक्रम का संचालन गुड्डू उपाध्याय ने किया। इस मौके पर मनोज यादव, जेपी सिंह, प्रवेश उपाध्याय, त्रिभुवन नाथ त्रिपाठी, टिटू त्रिपाठी, रामआसरे साहू, मदन साहू, शिवासरे गिरी, हनुमान त्रिपाठी, अंबिका गुप्ता समेत बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
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