
पति को पतन से बचा ले वही धर्मपत्नी : आचार्य शांतनु महाराज

मां का बेटे पर है पिता से 10 गुना अधिक अधिकार
श्रीरामकथा के छठवें दिन अयोध्याकांड, वनगमन और केवट संवाद का भावपूर्ण वर्णन
निषाद समाज के लालजी निषाद का वरिष्ठ भाजपा नेता ज्ञान प्रकाश सिंह ने किया सम्मानित
वरिष्ठ भाजपा नेता ज्ञान प्रकाश सिंह ने श्रीराम कथा कराकर जनपद को कर दिया राममय
जौनपुर। नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज मैदान में भाजपा के वरिष्ठ नेता ज्ञान प्रकाश सिंह द्वारा आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा के छठवें दिन कथाव्यास आचार्य शांतनु जी महाराज ने अयोध्याकांड, श्रीराम वनगमन, केवट संवाद और उर्मिला के त्याग सहित कई प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा के दौरान भगवान श्रीराम के वनगमन और केवट संवाद के प्रसंगों ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। इस अवसर पर मुख्य आयोजक ज्ञान प्रकाश सिंह ने निषाद समाज के लालजी निषाद का मंच पर सम्मानित किया।
आचार्य शांतनु जी महाराज ने कहा कि थोड़ा सा सत्संग मिल जाए तो जीवन धन्य हो जाता है, जबकि एक क्षण का कुसंग जीवन को नरक की ओर ले जा सकता है। सत्संग मनुष्य को अच्छे मार्ग पर ले जाता है, वहीं कुसंग उसे पतन की ओर धकेलता है। उन्होंने मंथरा और कैकेयी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि मंथरा पर कुसंग का प्रभाव था। उसने कैकेयी की बुद्धि को प्रभावित कर उनके मन में कौशल्या के प्रति संदेह पैदा किया। मंथरा ने कैकेयी से कहा कि भरत ननिहाल गए हैं और उनके साथ षड्यंत्र किया जा रहा है, जबकि भरत ही अयोध्या पर राज करेंगे। महाराज ने कहा कि कुसंग के प्रभाव में आकर व्यक्ति सही और गलत के बीच अंतर करना भूल जाता है।

वनगमन के प्रसंग का वर्णन करते हुए आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि भगवान श्रीराम ने पिता दशरथ की आज्ञा का पालन करते हुए वन जाना स्वीकार किया। श्रीराम ने वनवास को अपने लिए श्रेष्ठ बताते हुए कहा कि इससे रघुवंश कलंकित होने से बच जाएगा। वन में उन्हें महान साधु-संतों के दर्शन का अवसर मिलेगा और छोटे भाई भरत अयोध्या का राज्य संभालेंगे। जब माता कौशल्या को वनवास की जानकारी हुई तो उन्होंने कहा कि यदि पिता ने आज्ञा दी है तो राम वन न जाएं, लेकिन यदि माता कैकेयी ने कहा है तो उन्हें अवश्य वन जाना चाहिए।

महाराज ने कहा कि माता कौशल्या का त्याग अनुकरणीय है। माताओं के त्याग और संस्कारों के कारण ही परिवार और समाज मजबूत बनते हैं। उन्होंने कहा कि माता का अपने पुत्र पर पिता से दस गुना अधिक अधिकार माना गया है। माताओं के त्याग से प्रेरणा लेकर समाज को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

लक्ष्मण के वनगमन से पहले पत्नी उर्मिला से मिलने के प्रसंग का वर्णन करते हुए महाराज ने कहा कि उर्मिला ने लक्ष्मण के कुछ कहने से पहले ही उनकी परिस्थिति और मन की बात समझ ली थी। उन्होंने भगवान श्रीराम की सेवा के लिए लक्ष्मण के वन जाने को अपना सौभाग्य माना। उर्मिला ने उनसे केवल इतना कहा कि उनका दीपक बुझने न पाए। आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि पत्नी की परीक्षा विपत्ति में, सोने की परीक्षा अग्नि में और रणधीर की परीक्षा रणभूमि में होती है। जो पत्नी अपने पति को पतन से बचाकर सही मार्ग पर चलने में सहयोग करे, वही सच्ची अर्धांगिनी है। उन्होंने उर्मिला के त्याग का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने 14 वर्षों तक श्रृंगार नहीं किया, जबकि लक्ष्मण ने भगवान श्रीराम और माता सीता की सेवा के लिए 14 वर्षों तक निद्रा का त्याग किया। इस प्रसंग ने श्रद्धालुओं को भावुक कर दिया।

महाराज ने बताया कि पिता दशरथ की आज्ञा का पालन करने के लिए जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या से वन के लिए निकले तो पूरी अयोध्या उनके पीछे चल पड़ी। अयोध्यावासियों के साथ भगवान श्रीराम तमसा नदी के किनारे पहुंचे। रात में जब सभी लोग सो गए तो भगवान श्रीराम वहां से आगे निकल गए, ताकि अयोध्यावासी उनके वियोग में और अधिक व्याकुल न हों। इसके बाद वे गंगा नदी के तट पर पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात निषादराज से हुई।

गंगा नदी पार करने के लिए भगवान श्रीराम ने केवट से नाव मांगी। इस पर केवट ने कहा कि वह भगवान के मर्म को जानता है। उनके चरणों के स्पर्श से जब पत्थर नारी बन सकता है तो उसकी नाव भी नारी बन जाएगी। नाव ही उसकी जीविका का साधन है, इसलिए वह पहले भगवान के चरण पखारेगा। केवट की भक्ति और प्रेम से प्रसन्न होकर भगवान श्रीराम ने उसकी बात स्वीकार की। इसके बाद केवट ने भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण को गंगा पार उतारा। जब माता सीता ने उतराई के रूप में केवट को अपनी अंगूठी देनी चाही तो उसने उसे लेने से इनकार कर दिया। केवट ने कहा कि प्रभु, मैंने आपको नदी पार उतारा है, आप मुझे भवसागर से पार उतार दीजिए। केवट की इस निश्छल भक्ति और समर्पण का वर्णन सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

कथा के दौरान आचार्य शांतनु जी महाराज ने मुख्य आयोजक ज्ञान प्रकाश सिंह के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने भव्य श्रीरामकथा का आयोजन कर पूरे जनपद को राममय कर दिया है। कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और भक्तिमय वातावरण में श्रीराम के आदर्शों, त्याग, सेवा और समर्पण के प्रसंगों का श्रवण किया।

इस अवसर पर महाराज अधिकारी, श्री राम वल्लभा कुंज एवं श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र धार्मिक समिति के सदस्य, अयोध्या पूज्य राज कुमार दास महाराज, श्री चित्रकूट बालाजी ट्रस्ट के परम पूज्य महंत आलोक दास, चित्रकूट धाम के परम पूज्य महंत अरुण दास, नानक शाही उदासीन संगत, डालीगंज, लखनऊ के परम पूज्य महंत वीरेंद्र मुनि, कैबिनेट मंत्री एवं सुभासपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर, राज्य मंत्री रविन्द्र जायसवाल, सैयदराजा, चंदौली के विधायक सुशील सिंह, उत्तर भारतीय सेवा समिति के अध्यक्ष डॉ. राधेश्याम तिवारी, भाजपा नेता वेद प्रकाश सिंह ‘राजू भैया’, वानर सेना के संस्थापक अजीत प्रताप सिंह, भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष पुष्पराज सिंह, भाजपा के पूर्व जिला महामंत्री सुशील मिश्रा, डीसीएफ के चेयरमैन धनंजय सिंह, करंजाकला के ब्लॉक प्रमुख प्रतिनिधि सुनील यादव ‘मम्मन’, पूर्व विधायक सुषमा पटेल, जफराबाद के पूर्व विधायक डॉ. हरेंद्र सिंह, भाजपा महिला मोर्चा मछलीशहर की अध्यक्ष अनुपमा राय, डॉ. शुभा सिंह, पिंडरा के विधायक डॉ. अवधेश सिंह, पूर्व मंत्री जगदीश सोनकर, सुभासपा नेता जेपी सिंह, माउंट लिट्रा जी स्कूल के निदेशक अरविंद सिंह, पूर्वांचल विश्वविद्यालय कर्मचारी संघ के महामंत्री राधेश्याम सिंह ‘मुन्ना’ और पूर्व सभासद मिंटू पाठक समेत सैकड़ों गणमान्य लोग मौजूद रहे।












