
श्रीराम कथा श्रवण से जीवन की व्यथा समाप्त होती है : डॉ. मदन मोहन मिश्रा

सीताराम विवाह प्रसंग में दहेज प्रथा पर किया प्रहार, कथा के विश्राम दिवस पर श्रद्धालुओं ने किया भावपूर्ण श्रवण
चौकियां धाम, जौनपुर। शीतला चौकियां धाम में चल रही पांच दिवसीय श्रीराम कथा के पांचवें एवं अंतिम दिन वाराणसी से पधारे कथावाचक डॉ. मदन मोहन मिश्रा ने कहा कि श्रीराम कथा के श्रवण से जीवन की व्यथा समाप्त होती है। कथा के दौरान उन्होंने सीताराम विवाह प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन करते हुए सामाजिक कुरीतियों पर भी प्रहार किया। उन्होंने कहा कि राजा जनक धनुष न टूटने से दुखी थे, जबकि आज समाज में अनेक पिता दहेज रूपी धनुष न टूटने से दुखी हैं।
मड़ियाहूं पीजी कॉलेज में छह नवंबर को लगेगा वृहद रोजगार मेला, 50 से अधिक कंपनियां करेंगी प्रतिभागउन्होंने कहा कि रावण तलवार के बल पर सुधार चाहता था और परशुराम कुठार के बल पर, लेकिन भगवान श्रीराम ने अपने व्यवहार के बल पर सबका हृदय परिवर्तन किया। श्रीराम का धनुष सिर के नीचे और परशुराम जी का फरसा सिर के ऊपर रहने का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि शस्त्र का प्रयोग विवेक के नियंत्रण में होगा तो समाज में शांति रहेगी, लेकिन जब शस्त्र विवेक पर हावी हो जाएगा तो आतंकवाद और उग्रवाद को जन्म मिलेगा।
डॉ. मिश्रा ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की व्याख्या करते हुए कहा कि दशरथ जी को चार पुत्रों के रूप में चारों पुरुषार्थ प्राप्त हुए थे। श्रीराम के पीछे लक्ष्मण और भरत के साथ शत्रुघ्न के चलने का आध्यात्मिक संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि काम रूपी लक्ष्मण को मोक्ष रूपी श्रीराम के पीछे तथा अर्थ रूपी शत्रुघ्न को धर्म रूपी भरत के पीछे चलना चाहिए। उन्होंने कहा कि कलिकाल में श्रीराम मंगल के आयतन हैं। भारतीय संस्कृति में विवाह एक पवित्र संस्कार है। प्रत्येक बेटी अपने भाग्य के साथ सब कुछ लेकर आती है। बेटी के विवाह, रोगियों की सेवा, दुखियों की सहायता, समाज सेवा, गो रक्षा और परोपकार में समय लगाने वाले व्यक्ति का जीवन धन्य हो जाता है।
इसी क्रम में डॉ. अखिलेश चंद्र पाठक ने जयंत प्रसंग का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने कौए का रूप धारण कर माता सीता के चरणों में चोंच मारकर उन्हें घायल कर दिया था। इससे क्रोधित होकर भगवान श्रीराम ने कुश की एक तीली को मंत्रित कर ब्रह्मास्त्र बना दिया। उससे बचने के लिए जयंत तीनों लोकों में भटका, लेकिन कहीं शरण नहीं मिली। अंततः नारद मुनि की सलाह पर वह भगवान श्रीराम की शरण में पहुंचा। प्रभु ने दयालुता दिखाते हुए उसके प्राण तो बचा लिए, लेकिन ब्रह्मास्त्र की मर्यादा बनाए रखने के लिए उसकी दाईं आंख नष्ट कर दी।
कथा का संचालन गुड्डू उपाध्याय ने किया। पांच दिवसीय श्रीराम कथा के विश्राम दिवस पर शिवश्रय गिरी ने सभी श्रद्धालुओं एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।




