प्रेम और भक्ति से ही परमात्मा की प्राप्ति संभव: पं. रजनीकांत द्विवेदी

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श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिन गोवर्धन पूजा

गोपी प्रेम और माता-पिता के वात्सल्य का किया भावपूर्ण वर्णन

जौनपुर। नगर के विवाह मैरेज लॉन में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिन कथाव्यास पं. रजनीकांत द्विवेदी ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, गोवर्धन पूजा, गोपियों की भक्ति और माता-पिता के प्रेम का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति को परमात्मा की भक्ति प्राप्त हो जाती है, उसका जीवन धन्य हो जाता है। परमात्मा की कृपा अपार है और उनकी प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग प्रेम, समर्पण और निष्काम भक्ति है।

कथाव्यास ने गोवर्धन पूजा के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसके माध्यम से प्रकृति के महत्व और उसके संरक्षण का संदेश दिया। प्रकृति मनुष्य को जीवन की आवश्यक वस्तुएं और अनेक सुख-सुविधाएं प्रदान करती है। यदि मनुष्य प्रकृति से प्राप्त संसाधनों का संरक्षण करे और उनका विवेकपूर्ण उपयोग करे तो जीवन अधिक सुखमय बन सकता है। उन्होंने कहा कि प्रकृति का लगातार दोहन क्यों किया जा रहा है, इस पर प्रत्येक व्यक्ति को गंभीरता से विचार करना चाहिए। प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और उसके संरक्षण का भाव ही समाज को संतुलित जीवन की दिशा दे सकता है।

पं. रजनीकांत द्विवेदी ने भगवान श्रीकृष्ण और गोपियों के प्रेम का वर्णन करते हुए कहा कि गोपियों की भक्ति साधारण नहीं थी। उनके प्रेम में किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं था, बल्कि उनका संपूर्ण समर्पण भगवान श्रीकृष्ण के प्रति था। गोपी का अर्थ केवल स्त्री नहीं, बल्कि उस भाव से है जिसमें व्यक्ति अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए परमात्मा की ओर अग्रसर होता है। उन्होंने कहा कि गोपियों के चरित्र और उनकी भक्ति को समझने के लिए अंत:करण से चिंतन करना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति का नाम राधा है। जीव जिस प्रवृत्ति और विचारधारा के प्रभाव में रहता है, उसी दिशा में आगे बढ़ने लगता है। मनुष्य की प्रवृत्ति भी बंदर की तरह चंचल होती है, जो कभी एक डाल पर तो कभी दूसरी डाल पर पहुंच जाता है। इसलिए मन को स्थिर करके परमात्मा की भक्ति में लगाना चाहिए। व्यक्ति को सदैव यह भाव रखना चाहिए कि वह जो कुछ भी है, परमात्मा की कृपा से है।

कथाव्यास ने माता-पिता के प्रेम की व्याख्या करते हुए कहा कि पिता अपने पुत्र को जीवन में सफल देखना चाहता है। यदि पिता डॉक्टर या इंजीनियर है तो उसकी इच्छा होती है कि उसका पुत्र भी उसी क्षेत्र में आगे बढ़े। इसके पीछे पुत्र के उज्ज्वल भविष्य की कामना और उसकी सफलता की अपेक्षा रहती है। वहीं मां का प्रेम निष्काम होता है। वह अपने पुत्र से बिना किसी लाभ-हानि की चिंता किए हृदय से प्रेम करती है।
उन्होंने कहा कि सच्चे प्रेम में स्वार्थ और अपेक्षाओं का कोई स्थान नहीं होता। परमात्मा को भी केवल प्रेम और समर्पण के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। जब मनुष्य अपने अहंकार और स्वार्थ को छोड़कर भक्ति के मार्ग पर चलता है, तभी उसके जीवन में आध्यात्मिक आनंद का संचार होता है। कथा के माध्यम से उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेम, प्रकृति संरक्षण, सदाचार और निष्काम भक्ति

को जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी।
श्रीमद्भागवत कथा की मुख्य यजमान विमला सेठ हैं। छठवें दिन की कथा में राजेंद्र सिंह, सेवा भारती के विभागाध्यक्ष डॉ. तेज सिंह, डॉ. बीएस उपाध्याय, गंगाधर शुक्ल, चंद्रप्रकाश सोनी, ओमजी सहाय, नीरज शाह, पूनम तिवारी, निर्मला राय, गीता शुक्ला, विवेक सेठ, विनीत सेठ, अर्चना सेठ, विशाल सेठ, विपिन सेठ, हर्षित सेठ और हार्दिक सेठ सहित गठना कोठी परिवार के सदस्य एवं अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

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