एक-दूसरे का साथ निभाना श्रेष्ठ दांपत्य जीवन की पहचान : आचार्य शांतनु

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अंतिम दिन शबरी की भक्ति से श्रीराम के राज्याभिषेक तक का हुआ मार्मिक प्रसंग
14 वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे प्रभु श्रीराम
भगवान राम के राज्याभिषेक के साथ श्रीरामकथा का हुआ समापन

ज्ञान प्रकाश सिंह ऐसे ही श्रीरामकथा कराते रहें, जौनपुरवासी कथा में डूबकी लगाते रहे
जौनपुर। नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज मैदान में भाजपा के वरिष्ठ नेता ज्ञान प्रकाश सिंह द्वारा आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा के अंतिम दिन कथाव्यास आचार्य शांतनु जी महाराज ने भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने शबरी प्रसंग, बाली वध, सुंदरकांड, लंका विजय और भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की कथा सुनाकर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। कथा के दौरान उन्होंने पति-पत्नी के संबंधों, दांपत्य जीवन की मर्यादा, भक्त की अटूट आस्था और भगवान के

प्रति समर्पण के महत्व को विस्तार से समझाया।
आचार्य शांतनु जी महाराज ने कहा कि श्रेष्ठ दांपत्य जीवन की पहचान कठिन परिस्थितियों में एक-दूसरे का साथ निभाना है। पत्नी को पति के कष्ट के समय उसका साथ नहीं छोड़ना चाहिए। माता सीता का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यदि मां जानकी भगवान श्रीराम के साथ वनवास नहीं गई होतीं, तो लोग यही कहते कि पत्नी ने कठिन समय में अपने पति का साथ छोड़ दिया। पत्नी देवी स्वरूप होती है और परिवार में प्रेम, विश्वास तथा अच्छा वातावरण बनाए रखना दांपत्य जीवन की महत्वपूर्ण विशेषता है।
उन्होंने रामायण के लव-कुश प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि जब दोनों राजमहल में पहुंचकर ‘यह रामायण है, पूर्ण कथा श्रीराम की’ भजन गाते हैं, तो पूरा राजमहल भक्तिमय वातावरण से भर जाता है। महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में यज्ञ से लौटने के बाद जब लव और कुश अपनी माता सीता से मिलते हैं, तो माता उनका कुशलक्षेम पूछकर उन्हें अपने सीने से लगा लेती हैं। इस दौरान दोनों बालक माता को बताते हैं कि जब राजा पूजा कर रहे थे, तब उनके बगल में सोने की प्रतिमा रखी थी, जो बिल्कुल उनके जैसी दिखाई देती थी।

आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि यह सुनकर माता सीता ने अनुभव किया कि उनके प्रभु भगवान श्रीराम उनके बिना भी पूजा-अर्चना में उनकी उपस्थिति का सम्मान करते हैं। भगवान श्रीराम द्वारा सीता की स्वर्ण प्रतिमा के माध्यम से यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करना उनके प्रति सम्मान और समर्पण का प्रतीक था। इस प्रसंग से दांपत्य जीवन में प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति सम्मान का संदेश मिलता है।

शूर्पणखा प्रसंग का वर्णन करते हुए कथाव्यास ने कहा कि लक्ष्मण वैराग्य के प्रतीक हैं, जबकि शूर्पणखा वासना का प्रतीक है। जब शूर्पणखा भगवान श्रीराम के पास पहुंची, तो उन्होंने उसे लक्ष्मण की ओर संकेत कर दिया। इसके बाद जब शूर्पणखा माता सीता की ओर बढ़ी, तो लक्ष्मण ने उसकी नाक काट दी। अपमानित होकर शूर्पणखा अपने भाइयों खर और दूषण के पास पहुंची और पूरी घटना बताई। इसके बाद भगवान श्रीराम से हुए युद्ध में खर-दूषण मारे गए।
उन्होंने बताया कि इसके बाद शूर्पणखा रावण के पास पहुंची और अपने अपमान की बात कही। रावण ने बदला लेने का निश्चय किया और मारीच को अपने साथ चलने के लिए कहा। मारीच ने रावण को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ा रहा। अंततः मारीच ने सोचा कि रावण के हाथों मरने से बेहतर है कि भगवान श्रीराम के हाथों मृत्यु प्राप्त कर सद्गति हासिल की जाए।
इसके बाद रावण ने छलपूर्वक माता सीता का हरण कर लिया। माता सीता की खोज में भगवान श्रीराम और लक्ष्मण वन-वन भटकने लगे। आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि भगवान श्रीराम सब कुछ जानते थे, लेकिन उनकी लीलाओं में ही रामकथा का वास्तविक रस और जीवन के गूढ़ संदेश छिपे हुए हैं।
शबरी प्रसंग सुनाते हुए आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि शबरी जब अपने घर से निकलीं, तो महर्षि मतंग के आश्रम पहुंचीं। महर्षि मतंग ने उन्हें विश्वास दिलाया था कि एक दिन भगवान श्रीराम अवश्य उनकी कुटिया में आएंगे। गुरु के वचनों पर विश्वास करके शबरी लंबे समय तक प्रभु की प्रतीक्षा करती रहीं। उन्हें पूरा भरोसा था कि भगवान एक दिन उनके द्वार पर जरूर आएंगे।
उन्होंने कहा कि शबरी की भक्ति यह संदेश देती है कि सच्ची श्रद्धा और अटूट विश्वास के साथ की गई प्रतीक्षा कभी व्यर्थ नहीं जाती। जब भक्त का भगवान पर पूर्ण भरोसा होता है, तो भगवान भी अपने भक्त की सुध लेते हैं और उसका उद्धार करते हैं। शबरी का जीवन बताता है कि भगवान के लिए धन, वैभव या सामाजिक प्रतिष्ठा से अधिक महत्व प्रेम, भक्ति और समर्पण का है।
सुंदरकांड का प्रसंग सुनाते हुए आचार्य शांतनु महाराज ने बताया कि जब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका पहुंचे, तो वहां उन्होंने विभीषण को भगवान श्रीराम का भजन करते देखा। राक्षसों की नगरी लंका में भगवान का भजन करने वाले विभीषण को देखकर हनुमान जी को आश्चर्य हुआ। इसी दौरान दोनों की मुलाकात हुई और भगवान श्रीराम के प्रति विभीषण की भक्ति सामने आई।
उन्होंने कहा कि हनुमान जी ने लंका में माता सीता का पता लगाया और रावण की लंका में आग लगाकर भगवान श्रीराम के पराक्रम का संदेश दिया। यह प्रसंग बताता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति को सत्य, धर्म और भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। विभीषण ने रावण की नगरी में रहते हुए भी भगवान श्रीराम के प्रति अपनी आस्था बनाए रखी।
कथा के अंतिम चरण में आचार्य शांतनु महाराज ने भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन और राज्याभिषेक का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे, तो नगर में उत्सव का वातावरण छा गया। अयोध्यावासियों ने अपने आराध्य के आगमन पर हर्षोल्लास के साथ उनका स्वागत किया और विधि-विधान से उनका राज्याभिषेक संपन्न हुआ।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम का जीवन मर्यादा, त्याग, कर्तव्य और धर्मपालन की प्रेरणा देता है। वनवास से लेकर रावण पर विजय और फिर अयोध्या के राज्याभिषेक तक की यात्रा यह सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी धर्म और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। श्रीराम का आदर्श शासन समाज में न्याय, सद्भाव और लोककल्याण की भावना को मजबूत करने की प्रेरणा देता है।
नौ दिवसीय श्रीरामकथा के अंतिम दिन भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े इन प्रसंगों को सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। कथा के माध्यम से आचार्य शांतनु जी महाराज ने भक्ति, विश्वास, पारिवारिक मर्यादा, त्याग और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।
आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि श्रीराम कथा के मुख्य आयोजक ज्ञान प्रकाश सिंह की ऐसी मती बनी रहे कि वह ऐसे ही भव्य कथा का आयोजन करते रहे और जौनपुर के लोग रामकथा में डूबकी लगाते रहे। श्रीरामकथा में सेवाभारती के पदाधिकारी, कार्यकर्ता भी लगे रहे।
इस अवसर पर मुख्य सूचना आयुक्त एवं पूर्व डीजीपी राजकुमार विश्वकर्मा, चित्रकूट दिव्यांग विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आर.एन. त्रिपाठी, पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह, वाराणसी से सिद्धार्थ सिंह, भाजपा नेता सुधांशु सिंह, वाराणसी विकास प्राधिकरण के मानद सदस्य अम्बरीष सिंह ‘भोला’, पूर्व ब्लॉक प्रमुख सुभाष सिंह यादव, राजवीर सिंह ‘राजा’, संतोष मिश्रा, माध्यमिक शिक्षक संघ के नेता संतोष सिंह समेत अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

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