
मरण उसी का संभलता है जिसका जीवन संभला हुआ है : शांतनु महाराज

भरत के त्याग और भ्रातृ प्रेम का आचार्य शांतनु महाराज ने किया मार्मिक वर्णन
पिता के निधन का समाचार सुन टूट गए थे भरत, कैकेयी को मां कहने से कर दिया था इनकार
श्रीरामकथा के आठवें दिन भक्तों के जयकारों से गूंज उठा पंडाल
वरिष्ठ भाजपा नेता ज्ञान प्रकाश सिंह के नेक कार्य ने जनपदवासियों को बनाया भक्तिमय

जौनपुर। नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज मैदान में भाजपा के वरिष्ठ नेता ज्ञान प्रकाश सिंह की ओर से आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा के आठवें दिन कथाव्यास आचार्य शांतनु जी महाराज ने भरत चरित्र सहित रामायण के विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने भरत के त्याग, समर्पण, भ्रातृ प्रेम और भगवान श्रीराम के प्रति उनकी अटूट निष्ठा को विस्तार से समझाया। कथा के दौरान राजा दशरथ के निधन, भरत के अयोध्या लौटने और माता कैकेयी के प्रति उनके आक्रोश के प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावुक हो उठे। आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि मरण उसी का संभलता है, जिसका जीवन संभला हुआ होता है। राजा दशरथ जीवनभर भगवान श्रीराम का दर्शन करते रहे और अंतिम समय में भी उनके मुख से छह बार राम-राम निकला। उन्होंने कहा कि जिसने जीवनभर कलह और गलत कर्म किए हों, उसका अंतिम समय भी सहज नहीं हो सकता। यदि व्यक्ति ने पहले से सत्कर्म नहीं किए हैं तो अंतिम समय में किए जाने वाले दान का भी अपेक्षित फल नहीं मिल पाता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जीवनभर के आचरण का प्रभाव मनुष्य के अंतिम समय तक बना रहता है।

कथाव्यास ने राजा दशरथ और कैकेयी के प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम के वनवास की बात सुनकर राजा दशरथ अत्यंत व्याकुल हो गए थे। उन्होंने कैकेयी से अपनी मांग वापस लेने की विनती की, लेकिन कैकेयी का हृदय नहीं पसीजा। अंततः श्रीराम के वियोग में राजा दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिए। उस समय भगवान श्रीराम और लक्ष्मण वन जा चुके थे। ऐसे में राजा दशरथ के अंतिम समय में उनके पुत्र भी उनके पास नहीं थे।

आचार्य शांतनु महाराज ने बताया कि राजा दशरथ के निधन के बाद गुरुजनों के निर्देश पर दो सेवकों को भरत और शत्रुघ्न को उनके ननिहाल से अयोध्या बुलाने के लिए भेजा गया। माता कौशल्या ने सेवकों से कहा था कि भरत को अयोध्या की स्थिति के बारे में कुछ न बताया जाए, क्योंकि पिता के निधन और राम के वनवास का समाचार सुनकर वह असहनीय दुख में डूब जाएंगे। आचार्य ने भरत के अयोध्या लौटने का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि ननिहाल से लौटते समय रास्ते में पसरे सन्नाटे और बदले हुए वातावरण को देखकर भरत का मन पहले से ही आशंकित हो उठा था। अयोध्या पहुंचने पर वह सीधे उस कक्ष में गए, जहां उनके पिता राजा दशरथ और माताएं रहा करती थीं। वहां माता कैकेयी ने उनसे ननिहाल का हालचाल पूछा। इसके बाद जब भरत ने अयोध्या और पिता के बारे में जानकारी मांगी तो कैकेयी ने बताया कि विधाता ने एक ऐसी घटना घटा दी है, जिसमें उनके पिता अब इस दुनिया में नहीं रहे। पिता के निधन का समाचार सुनते ही भरत व्याकुल होकर गिर पड़े।

आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने भरत के दुख और उनके आंसुओं के माध्यम से उनके चरित्र की महानता को दर्शाया है। भरत इस बात से व्यथित थे कि वह अपने पिता के अंतिम दर्शन भी नहीं कर सके और उनके प्रिय बड़े भाई श्रीराम तथा लक्ष्मण वन को चले गए। उन्होंने कहा कि जब दुख सहने की सीमा में रहता है तो आंखों से आंसू बहते हैं, लेकिन जब दुख असहनीय हो जाता है तो व्यक्ति विलाप करने लगता है। भरत की स्थिति भी ऐसी ही थी।

कथाव्यास ने बताया कि पिता के निधन और श्रीराम के वनवास का कारण जानकर भरत अपनी माता कैकेयी से अत्यंत नाराज हो गए। उन्होंने कैकेयी को उनके निर्णय के लिए कठोर शब्द कहे और कहा कि उन्हें कभी उम्मीद नहीं थी कि उनकी माता राजगद्दी प्राप्त करने के लिए इस सीमा तक चली जाएंगी। जब राजा दशरथ श्रीराम को वन भेजने के निर्णय से दुखी होकर कैकेयी के सामने विनती कर रहे थे, तब भी उनका हृदय क्यों नहीं पसीजा? आचार्य ने इस प्रसंग के माध्यम से बताया कि भरत के लिए राजगद्दी से अधिक महत्वपूर्ण उनके पिता का सम्मान और बड़े भाई श्रीराम का स्नेह था। वह अपनी माता के निर्णय को स्वीकार नहीं कर सके। इसी आक्रोश में उन्होंने कैकेयी को मां कहने से भी इनकार कर दिया। उन्होंने आगे बताया कि जब 14 वर्ष का वनवास पूरा होने के बाद भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो कैकेयी ने उनसे अपनी पीड़ा व्यक्त की। उन्होंने श्रीराम से कहा कि भरत अब उन्हें मां नहीं कहते हैं। भगवान श्रीराम ने भरत को समझाया कि कैकेयी उनकी माता हैं और उन्हें मां का सम्मान देना चाहिए। इस पर भरत ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि माता कैकेयी के कारण ही भगवान श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास भोगना पड़ा, पिता दशरथ का निधन हो गया और अयोध्या अनाथ हो गई। ऐसे में वह उन्हें मां कैसे कहें? भगवान श्रीराम के समझाने पर अंततः भरत ने कैकेयी को फिर से मां कहा।
आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि रामचरितमानस में जब भ्रातृ प्रेम और त्याग की चर्चा होती है तो भरत का नाम सबसे पहले लिया जाता है। लक्ष्मण 14 वर्ष तक भगवान श्रीराम के साथ परछाईं की तरह रहे और उनकी सेवा में निरंतर समर्पित रहे। इसके बावजूद भरत का त्याग और उनका प्रेम एक अलग आदर्श प्रस्तुत करता है। उन्होंने राजगद्दी को स्वीकार करने के बजाय भगवान श्रीराम के प्रति अपनी निष्ठा को सर्वोपरि रखा। उन्होंने कहा कि भरत का चरित्र हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम अधिकार जताने में नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण और दूसरे के सम्मान की रक्षा करने में है। भरत ने अपने बड़े भाई के प्रति जिस तरह का आदर और प्रेम दिखाया, वह आज भी पारिवारिक संबंधों के लिए प्रेरणादायक है। रामकथा के इन प्रसंगों के माध्यम से आचार्य ने श्रद्धालुओं को परिवार में प्रेम, मर्यादा, त्याग और सदाचार बनाए रखने का संदेश दिया।
श्रीरामकथा के आठवें दिन आयोजित कार्यक्रम में लोकसभा डुमरियागंज के सांसद जगदंबिका पाल, पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं सांसद रीता बहुगुणा जोशी, राज्यसभा सांसद साधना सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री महेंद्रनाथ पांडेय, भाजपा काशी क्षेत्र के क्षेत्रीय अध्यक्ष अशोक चौरसिया, पूर्व सांसद धनंजय सिंह और भाजपा जौनपुर के जिलाध्यक्ष अजीत प्रजापति उपस्थित रहे। इसके अलावा अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती, उत्तर प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव अमित घोष, यूपीआइकॉन के प्रबंध निदेशक प्रवीण सिंह, आयकर आयुक्त कुमार ऋषिकेश, उद्योग विभाग के अपर आयुक्त हरीश प्रताप सिंह, अभिषेक शुक्ल, तिलकधारी इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. सत्यप्रकाश सिंह, पूर्व सभासद विनय सिंह, कर्मचारी संघ के जिलाध्यक्ष बृजेश सिंह, संतोष सिंह ‘सत्या’, प्रधानपुर के बृजेश सिंह, अमित सिंह, सुमित सिंह, माउंट लिट्रा जी स्कूल के निदेशक अरविंद सिंह और संजय सिंह सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे।








