2 करोड़ से अधिक की रकम गंवा चुके लोग, साइबर सेल ने 70 लाख रुपये कराए होल्ड; अधिकारी-कर्मचारी भी बने निशाना
जौनपुर। जिले में साइबर अपराधियों का नेटवर्क तेजी से फैलता जा रहा है। ठग अब आम लोगों के साथ ही सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को भी अपने जाल में फंसा रहे हैं। 14 अगस्त से 14 सितंबर के बीच जिले में साइबर अपराध से जुड़ी करीब 900 शिकायतें सामने आई हैं। पीड़ितों के अनुसार इन मामलों में दो करोड़ रुपये से अधिक की रकम गंवाई गई है।
साइबर सेल ने शिकायतों पर कार्रवाई करते हुए अब तक करीब 300 मामलों का निस्तारण किया है। कार्रवाई के दौरान करीब 70 लाख रुपये की रकम होल्ड कराने में सफलता मिली है। वहीं लगभग 600 शिकायतों पर अभी कार्रवाई चल रही है।
बीते एक महीने में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी का बड़ा मामला भी सामने आया। जालसाजों ने खुद को दूरसंचार विभाग और दिल्ली पुलिस का अधिकारी बताकर एक व्यक्ति को गंभीर मामले में फंसने का डर दिखाया। कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर उसे डिजिटल अरेस्ट का भय दिखाया गया और करीब 70 लाख रुपये की रकम ठग ली गई। मामले में साइबर सेल ने कार्रवाई करते हुए 13 लाख रुपये होल्ड कराए हैं।
साइबर ठगों ने जिला कार्यक्रम अधिकारी अजीत कुमार सिंह को भी निशाना बनाया। उनके दो बैंक खातों से 3 और 4 सितंबर को अलग-अलग transactions के जरिए करीब दो लाख रुपये निकाल लिए गए। इसी तरह जफराबाद क्षेत्र में सिविल कोर्ट के रीडर शशांक रघुवंशी को गैस बिल अपडेट कराने के नाम पर संदिग्ध लिंक भेजकर करीब 74 हजार रुपये की ठगी की गई।
लाइन बाजार क्षेत्र की एक महिला को फेसबुक के माध्यम से टेलीग्राम समूह में जोड़कर कम समय में रकम दोगुनी करने का लालच दिया गया। महिला ने भरोसा करके करीब 1.90 लाख रुपये निवेश कर दिए। बाद में उसे ठगी का पता चला।
साइबर सेल प्रभारी देवानंद रजक के अनुसार, साइबर अपराधियों द्वारा लोगों को ठगने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में डर और लालच का इस्तेमाल किया जाता है। कभी जांच एजेंसी या पुलिस अधिकारी बनकर कानूनी कार्रवाई की धमकी दी जाती है तो कभी निवेश पर अधिक मुनाफे का झांसा दिया जाता है। इसके अलावा बैंक खाता, सिम या गैस कनेक्शन बंद होने का भय दिखाकर फर्जी लिंक भी भेजे जाते हैं।
साइबर ठगी होने पर पीड़ित को बिना देरी किए 1930 हेल्पलाइन पर शिकायत करनी चाहिए और संबंधित बैंक को भी तत्काल सूचना देनी चाहिए। किसी अनजान व्यक्ति को ओटीपी, एटीएम पिन, पासवर्ड या कार्ड की गोपनीय जानकारी नहीं देनी चाहिए। अनजान लिंक खोलने और स्क्रीन साझा करने वाले एप डाउनलोड करने से भी बचना जरूरी है। पुलिस या कोई जांच एजेंसी फोन अथवा वीडियो कॉल के माध्यम से पैसे जमा करने को नहीं कहती और डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है।

