डीडीएस में महिला सशक्तिकरण, अल्पसंख्यक अधिकारों एवं नागरिक बोध पर विद्यार्थियों के बीच सार्थक संवाद
जौनपुर। सिपाह, रासमंडल स्थित डीडीएस ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस में रविवार को महिला सशक्तिकरण, अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में उन्हें पुरुषों के समान अवसर उपलब्ध कराने के विषय पर विद्यार्थियों के बीच एक सार्थक एवं विचारोत्तेजक परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि एवं निर्णायक सदस्य मोहम्मद जीशान खान, उपप्रधानाचार्य, ब्लॉसम पब्लिक स्कूल ने विद्यार्थियों से संवाद करते हुए कहा कि महिलाओं और युवतियों के लिए अपने अधिकारों की जानकारी होना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक पुरुषों के लिए अपनी जिम्मेदारियों तथा नागरिक बोध को समझना भी है। उन्होंने कहा कि प्रतिभा किसी धर्म, जाति अथवा समुदाय की सीमाओं में बंधी नहीं होनी चाहिए। यदि किसी लड़की में योग्यता, प्रतिभा और आगे बढ़ने की क्षमता है, तो परिवार और समाज को उसका मार्ग रोकने के बजाय उसका सहयोग करना चाहिए।
विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों एवं विचारों के आधार पर निर्णायक मंडल द्वारा परिणाम घोषित किए गए, जिसमें प्रथम स्थान — शिबू, द्वितीय स्थान — इब्राहिम, तृतीय स्थान — रहीमा, चतुर्थ स्थान — नैंसी वर्मा और पंचम स्थान — प्रियम रहे। विद्यार्थियों के विचार सुनने के बाद मोहम्मद जीशान खान ने कहा कि जब इस प्रकार की संगोष्ठियां प्रतियोगिता का रूप लेती हैं, तो विद्यार्थियों को किसी विषय के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों को समझने का अवसर मिलता है। इससे उनमें तर्क करने, अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने, विषय को समझने तथा दूसरों के विचारों को सम्मानपूर्वक सुनने की क्षमता विकसित होती है। उन्होंने विद्यार्थियों को निरंतर अध्ययन, अभ्यास, संवाद और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि जीवन में किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास और अभ्यास आवश्यक है।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर संस्था की संचालिका आरती सिंह ने सभी विद्यार्थियों को कार्यक्रम में सहभागिता के लिए धन्यवाद एवं शुभकामनाएं दीं। उन्होंने मुख्य अतिथि एवं निर्णायक सदस्य मोहम्मद जीशान खान के प्रति भी आभार व्यक्त किया। आरती सिंह ने कहा कि महिलाओं एवं अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों की बात करने के साथ-साथ समाज के प्रत्येक व्यक्ति में नागरिक बोध, सामाजिक जिम्मेदारी और पारस्परिक सम्मान की भावना विकसित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जब किसी भी जाति, धर्म अथवा समुदाय के लोगों में एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करने और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाने की भावना विकसित होगी, तभी वास्तविक समानता स्थापित हो सकेगी।


