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    भारत में इन्फ्लुएंसर की कानूनी जवाबदेही: सोशल मीडिया प्रमोशन कब बन सकता है कानूनी परिणाम का कारण

    भारत में इन्फ्लुएंसर की कानूनी जवाबदेही: सोशल मीडिया प्रमोशन कब बन सकता है कानूनी परिणाम का कारण
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    एक क्रिकेटर डिजिटल पेमेंट ऐप का प्रचार करता है, फिल्म स्टार किसी सप्लीमेंट का समर्थन करता है और सोशल मीडिया क्रिएटर किसी स्किनकेयर उत्पाद को “वास्तव में काम करने वाला” बताता है। उपभोक्ता इसे व्यक्तिगत राय समझ सकता है, लेकिन इसके पीछे अक्सर व्यावसायिक संबंध होता है।

    सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने विज्ञापन में जिम्मेदारी का प्रश्न भी महत्वपूर्ण बना दिया है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 और CCPA के 2022 के दिशानिर्देश ने विज्ञापनदाताओं और एंडोर्सर्स की जिम्मेदारी को अधिक स्पष्ट किया है। लोकप्रियता किसी विज्ञापन की पहुंच बढ़ा सकती है, लेकिन किसी एंडोर्सर को कानून से ऊपर नहीं रखती।

    अधिनियम की धारा 2(1) में विज्ञापन की व्यापक परिभाषा दी गई है, जबकि धारा 2(18) एंडोर्समेंट को उपभोक्ता द्वारा एंडोर्सर की राय, निष्कर्ष या अनुभव को प्रतिबिंबित करने वाले संदेश के रूप में देखती है। धारा 21 के तहत CCPA झूठे या भ्रामक विज्ञापन को बंद करने या उसमें संशोधन का निर्देश दे सकता है। पहली बार के उल्लंघन पर ₹10 लाख तक और बाद के उल्लंघनों पर ₹50 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। एंडोर्सर को कुछ समय के लिए एंडोर्समेंट करने से प्रतिबंधित भी किया जा सकता है।

    हालांकि, उत्पाद के बाद में दोषपूर्ण पाए जाने मात्र से इन्फ्लुएंसर स्वतः उत्तरदायी नहीं होता। धारा 21(5) के तहत विज्ञापन में किए गए दावों की सत्यता की जांच के लिए उचित सावधानी बरतना महत्वपूर्ण है।

    यदि किसी इन्फ्लुएंसर को भुगतान किया गया है, मुफ्त उत्पाद मिला है या ब्रांड से कोई महत्वपूर्ण व्यावसायिक संबंध है, तो उसका स्पष्ट खुलासा किया जाना चाहिए। ASCI के अनुसार परिस्थितियों के आधार पर “Ad”, “Sponsored”, “Collaboration” या “Partnership” जैसे स्पष्ट लेबल इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य विज्ञापन रोकना नहीं, बल्कि व्यावसायिक प्रचार को स्वतंत्र व्यक्तिगत सिफारिश के रूप में प्रस्तुत होने से रोकना है।

    2026 में The Whole Truth Strawberry Shake Protein Powder के Instagram प्रमोशन से जुड़े मामले में ASCI ने उचित disclosure न होने पर शिकायत को सही माना। यह दिखाता है कि सामान्य सोशल मीडिया पोस्ट जैसी दिखने वाली सामग्री भी नियामकीय जांच के दायरे में आ सकती है।

    इसी प्रकार, Indian Medical Association v. Union of India में पतंजलि आयुर्वेद से जुड़े विज्ञापनों के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाही ने विज्ञापनदाताओं, एजेंसियों और एंडोर्सर्स की जिम्मेदारी को चर्चा में ला दिया। 11 अगस्त 2025 को न्यायालय ने रिट याचिका का निपटारा किया। हालांकि, इन कार्यवाहियों को इन्फ्लुएंसर की कानूनी जवाबदेही की पूरी तरह नई श्रेणी स्थापित करने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    AI और वर्चुअल इन्फ्लुएंसर विज्ञापन के लिए नई चुनौती हैं। Information Technology Rules, 2021 में फरवरी 2026 के संशोधनों ने “synthetically generated information” (SGI) से संबंधित प्रावधानों को स्पष्ट किया। इससे यह प्रश्न उठता है कि कृत्रिम व्यक्तित्व द्वारा किए गए प्रचार के लिए जिम्मेदार कौन होगा।

    इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग को रोका नहीं जाना चाहिए, लेकिन इसे सत्यपूर्ण, पारदर्शी और जिम्मेदार होना आवश्यक है। ब्रांड्स को अपने दावों का आधार प्रस्तुत करना चाहिए और इन्फ्लुएंसर्स को अपनी विश्वसनीयता किसी उत्पाद से जोड़ने से पहले उचित सावधानी बरतनी चाहिए।

    लोकप्रियता विज्ञापन की पहुंच बढ़ा सकती है, लेकिन उपभोक्ता के सत्यपूर्ण जानकारी प्राप्त करने के अधिकार की कीमत पर नहीं।

    श्रुति त्रिपाठी
    CMP डिग्री कॉलेज
    लॉ फैकल्टी
    इलाहाबाद विश्वविद्यालय

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