
परमात्मा को रिझाने के लिए नहीं होना चाहिए दिखावा : शांतनु जी महाराज

तीसरी बार रामकथा कराकर ज्ञान प्रकाश सिंह ने जनपदवासियों को धर्म से जोड़ा
भोला केवट की कथा सुनकर नम हुईं श्रोताओं की आंखें
तीसरे दिन बाल लीला, अहिल्या उद्धार और प्रभु की करुणा के प्रसंगों ने किया भावविभोर
जौनपुर। नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज मैदान में भाजपा के वरिष्ठ नेता ज्ञान प्रकाश सिंह की ओर से आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा के तीसरे दिन कथाव्यास आचार्य शांतनु जी महाराज ने भगवान श्रीराम की बाल लीलाओं, भोला केवट प्रसंग और अहिल्या उद्धार की कथा का भावपूर्ण वर्णन किया। उनके मुखारविंद से निकले प्रसंगों ने श्रद्धालुओं को भक्ति और भावनाओं से सराबोर कर दिया। विशेष रूप से भोला केवट की कथा सुनकर अनेक श्रोताओं की आंखें नम हो गईं। महाराज ने कहा कि भगवान का स्वभाव करुणा से परिपूर्ण है। परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए किसी प्रकार के दिखावे की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सच्चे मन से उनके चरणों में समर्पित होना जरूरी है।
आचार्य शांतनु जी महाराज ने भक्ति के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भजन की दौड़ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक होती है। भगवान की भक्ति केवल बाहरी आडंबर या दूसरों को देखकर नहीं की जा सकती। इसके लिए मन में सच्ची लगन और समर्पण का भाव होना चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरों को देखकर भजन नहीं होता। भक्ति में व्यक्ति को अपने मन को भगवान के चरणों में लगाना पड़ता है। मन, वचन और कर्म से श्रीराम के प्रति समर्पित होना ही सच्ची भक्ति है।
उन्होंने कहा कि भक्ति का अनुभव वही व्यक्ति कर सकता है, जिसके हृदय में भगवान के प्रति गहरा प्रेम जागृत हो चुका हो। भजन का दर्द हर कोई नहीं समझ सकता। जिस प्रकार किसी रोग से पीड़ित व्यक्ति ही उसकी पीड़ा को सही मायने में जानता है, उसी प्रकार भगवान के प्रेम में डूबा भक्त ही भक्ति की गहराई को समझ सकता है। उन्होंने भक्त मीरा का उदाहरण देते हुए कहा कि जब मीरा भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबी रहती थीं, तब लोग उन्हें पागल समझते थे। वास्तव में उनका मन प्रभु के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित था।
कथाव्यास ने भगवान श्रीराम के प्रेम और करुणा को दर्शाने के लिए भोला केवट की एक मार्मिक कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि भोला केवट ने अपनी बेटी की शादी के लिए एक सेठ से 200 रुपये उधार लिए थे। बाद में उसने पूरी रकम सेठ को लौटा दी, लेकिन सेठ ने रुपये वापस मिलने से इनकार कर दिया और भोला केवट के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया। मामला न्यायालय तक पहुंच गया।
महाराज ने कथा को आगे बढ़ाते हुए बताया कि न्यायालय में जब भोला केवट से पूछा गया कि उसने रुपये लौटाए थे तो इसका कोई गवाह है, तब उसने कहा कि रघुनाथ जी इस बात के गवाह हैं। इसके बाद न्यायालय में रघुनाथ जी को बुलाया गया। एक वृद्ध व्यक्ति सफेद वस्त्र धारण किए और हाथ में लाठी लेकर वहां पहुंचे। उन्होंने न्यायाधीश के सामने भोला केवट के पक्ष में गवाही दी।
कथा के अनुसार, रघुनाथ जी ने बताया कि भोला केवट ने सेठ के रुपये लौटा दिए थे और इसकी पर्ची सेठ के बहीखाते में एक निश्चित पृष्ठ पर दर्ज है। जब सेठ का रजिस्टर देखा गया तो उसमें रुपये लौटाए जाने का प्रमाण मिल गया। इस प्रकार भोला केवट पर लगा आरोप गलत साबित हुआ। इसके बाद रघुनाथ जी वहां से अंतर्ध्यान हो गए।
आचार्य शांतनु जी महाराज ने बताया कि रघुनाथ जी के अंतर्ध्यान होने के बाद न्यायाधीश ने भोला केवट से पूछा कि रघुनाथ जी कहां रहते हैं। भोला केवट ने उत्तर दिया कि वे मंदिर में रहते हैं। यह सुनकर न्यायाधीश के मन में भगवान के प्रति श्रद्धा और वैराग्य का भाव जाग उठा। कथा के अनुसार, उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया और साधु जीवन अपना लिया।
इस प्रसंग के माध्यम से महाराज ने समझाया कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी रूप में सहायता कर सकते हैं। सच्चे मन से प्रभु पर विश्वास रखने वाले भक्त को कठिन परिस्थितियों में भी निराश नहीं होना चाहिए। भगवान के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण ही भक्ति की सबसे बड़ी शक्ति है। कथा के इस प्रसंग ने पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।
महाराज ने जीवन के सुख-दुख पर चर्चा करते हुए कहा कि कष्ट का समय बहुत भारी लगता है, जबकि आनंद के क्षण कब बीत जाते हैं, इसका पता भी नहीं चलता। इसलिए जब परमात्मा जीवन में आनंद और सुख प्रदान करें तो उसका सदुपयोग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन अनिश्चित है और पता नहीं कब बुलावा आ जाए। इसलिए व्यक्ति को अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को सार्थक बनाना चाहिए तथा प्रभु का स्मरण करते हुए सद्कर्मों में लगा रहना चाहिए।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों से घबराने के बजाय भगवान पर भरोसा बनाए रखें। सुख के समय अहंकार नहीं करना चाहिए और दुख के समय अपनी आस्था को कमजोर नहीं पड़ने देना चाहिए। प्रभु की कृपा पर विश्वास रखते हुए जीवन जीना ही सच्चे भक्त की पहचान है।
श्रीरामकथा के दौरान आचार्य शांतनु जी महाराज ने भगवान शिव और भगवान श्रीराम के परस्पर प्रेम का प्रसंग भी सुनाया। उन्होंने बताया कि भगवान भोलेनाथ भगवान श्रीराम के दर्शन करने के लिए कागभुशुंडी के साथ अयोध्या पहुंचे, लेकिन उन्हें दर्शन की अनुमति नहीं मिल सकी। इससे निराश होकर वे सरयू नदी के किनारे बैठ गए और भगवान राम के दर्शन करने का उपाय खोजने लगे।
कथा के अनुसार, कागभुशुंडी ने भोले बाबा को ज्योतिषी का रूप धारण करने का सुझाव दिया। एक दिन बालक राम रो रहे थे और चुप नहीं हो रहे थे। माता कौशल्या ने जब उन्हें शांत कराने का प्रयास किया तो सफलता नहीं मिली। तब उन्हें सरयू नदी के किनारे रहने वाले ज्योतिषी को बुलाने की सलाह दी गई।
ज्योतिषी के रूप में भगवान भोलेनाथ को बुलाया गया। इस प्रकार उन्हें बालक राम के दर्शन करने का अवसर मिल गया। महाराज ने इस प्रसंग के माध्यम से भगवान शिव और श्रीराम के बीच प्रेम तथा भक्ति के संबंध को समझाया। उन्होंने कहा कि शास्त्रीय परंपरा में भगवान शिव को श्रीराम का आराध्य और भगवान श्रीराम को शिव का आराध्य बताया गया है। दोनों के बीच का यह प्रेम भक्तों के लिए समर्पण और श्रद्धा का आदर्श है।
महाराज ने इसी प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए बताया कि जब माता पार्वती को पता चला कि भगवान भोलेनाथ अयोध्या में भगवान राम के दर्शन करने गए थे और उन्हें साथ नहीं ले गए, तो उन्होंने इस बात को अपने मन में गांठ बांध लिया। उन्होंने इस प्रसंग को रोचक अंदाज में प्रस्तुत करते हुए नारी के स्वभाव और पारिवारिक संबंधों से जुड़ी बातों का उल्लेख किया। कथा के दौरान श्रद्धालु प्रसंगों को ध्यानपूर्वक सुनते रहे और पंडाल में भक्ति का वातावरण बना रहा।
आचार्य शांतनु जी महाराज ने भगवान श्रीराम और माता अहिल्या से जुड़े प्रसंग का भी मार्मिक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि जब भगवान श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण के साथ गुरु विश्वामित्र के मार्गदर्शन में मिथिला जा रहे थे, तब रास्ते में उन्हें एक पत्थर दिखाई दिया। भगवान राम ने गुरु विश्वामित्र से उसके बारे में पूछा।
गुरु विश्वामित्र ने बताया कि वह पत्थर वास्तव में महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या हैं, जिन्हें श्राप के कारण पत्थर जैसी अवस्था में रहना पड़ा था। वे लंबे समय से भगवान श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही थीं। जैसे ही भगवान श्रीराम का चरण उस पत्थर पर पड़ा, अहिल्या अपने पूर्व स्वरूप में प्रकट हो गईं।
महाराज ने इस प्रसंग के माध्यम से भगवान श्रीराम की कृपा, करुणा और उद्धार करने वाली शक्ति का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि प्रभु की कृपा से जीवन में नई आशा का संचार होता है। अहिल्या उद्धार का प्रसंग श्रद्धालुओं के लिए आस्था, प्रतीक्षा और प्रभु की कृपा का संदेश लेकर आया।
कथा के दौरान आचार्य शांतनु जी महाराज ने मुख्य आयोजक भाजपा के वरिष्ठ नेता ज्ञान प्रकाश सिंह के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि ज्ञान प्रकाश सिंह ने इस श्रीरामकथा और भव्य कलश यात्रा का यूट्यूब तथा सोशल मीडिया के माध्यम से व्यापक प्रचार-प्रसार कराया है। इसके कारण देशभर में इस धार्मिक आयोजन की चर्चा हो रही है। उन्होंने आयोजन को भव्य बनाने में सहयोग कर रही सेवाभारती की भी प्रशंसा की। महाराज ने कहा कि सेवाभारती के कार्यकर्ता पूरे मनोयोग से आयोजन की व्यवस्थाओं में जुटे हुए हैं। धार्मिक आयोजन की सफलता में आयोजकों के साथ ही उन सभी कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जो सेवा भाव से अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं।
उल्लेखनीय है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता ज्ञान प्रकाश सिंह की ओर से जौनपुर में तीसरी बार भव्य श्रीरामकथा का आयोजन किया जा रहा है। नौ दिवसीय इस आयोजन के माध्यम से जनपदवासियों को भगवान श्रीराम के जीवन, आदर्शों और भक्ति परंपरा से जुड़ने का अवसर मिल रहा है। कथा सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं और धार्मिक प्रसंगों का आनंद ले रहे हैं। स्थानीय श्रद्धालुओं का कहना है कि इस तरह की श्रीरामकथा सुनने का अवसर मिलना सौभाग्य की बात है। कथा के माध्यम से उन्हें भगवान श्रीराम के आदर्शों, करुणा, प्रेम, त्याग और समर्पण को समझने का अवसर मिल रहा है। आयोजन को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह बना हुआ है। तीसरे दिन की कथा में बाल लीला, भोला केवट और अहिल्या उद्धार जैसे प्रसंगों ने भक्तों को भावनात्मक रूप से जोड़ते हुए पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
इस अवसर पर माउंट लिट्रा जी स्कूल के निदेशक अरविंद सिंह, अमित सिंह, सुमित सिंह, राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के पूर्व अध्यक्ष राकेश श्रीवास्तव, मिलथलेश नारायण जी (क्षेत्र बौद्धिक शिक्षण प्रमुख), विपिन सिंह (क्षेत्रीय उपाध्यक्ष, भाजपा), मुरलीपाल जी (प्रांत कार्यवाह, आरएसएस), डॉ. अजय सिंह (जिलाध्यक्ष, भाजपा मछलीशहर), बी.पी. सरोज (पूर्व सांसद, मछलीशहर), कुंवर वीरेंद्र प्रताप सिंह (पूर्व राज्यमंत्री), पप्पू रघुवंशी (सपा नेता), नीरज मौर्य (भाजपा नेता), नागेश्वर जी (पूर्व जिला संगठन मंत्री, भाजपा), संदीप सिंह (पूर्व ब्लॉक प्रमुख, जलालपुर), दिनेश टंडन (पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष), राय अभय सिंह, मनोज मिश्र (डीन, मास कम्युनिकेशन, पूर्वांचल विश्वविद्यालय), मनोज सिंह एवं विजय सिंह (प्रोफेसर, टी.डी. कॉलेज), आर्यन बाबू (भोजपुरी गायक), राजेश यादव (उद्योगपति एवं समाजसेवी, मुंगरा बादशाहपुर), वशिष्ठ सिंह (आधुनिक जलपान), राजेश सिंह (चंद्रा होटल), जे.पी. सिंह (जेपी होटल), मुरारी पांडेय एवं विनय सिंह (वाराणसी), वीरेंद्र सिंह (देवकली), विनोद सिंह (टेकारी), पम्मू सिंह (चितौड़ी), संतोष मिश्र सुग्गू (सभासद, कजगांव), सतीश श्रीवास्तव, अरुण सिंह, माला सिंह, शिवपूजन पांडेय एवं प्रमोद पांडेय सहित गणमान्य लोग उपस्थित रहे।


















